*पानी को कितना भी गर्म कर लें* *पर वह थोड़ी देर बाद* *अपने मूल स्वभाव में* *आकर शीतल हो जाता हैं* । *इसी प्रकार हम कितने भी क्रोध में, भय में,अशांति में रह लें,* *थोड़ी देर बाद-बोध में,* *निर्भयता में और प्रसन्नता में* *हमें आना ही होगा क्योंकि यही हमारा मूल स्वभाव है।* 🙏🏻🙏🏻🙏🏻